कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।
कुछ लूट के बैठ विपक्ष में तो कुछ सरकार बनके।।
कौन कहता है कि भारत आजाद हो गया है
देश के सिर फिर विश्वगुरु का ताज हो रहा है
कुछ भाषण देकर लूट रहे कुछ परचार करके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।
बच्चों को पढ़ाने के लिए बाप खेत बेच रहा
पढ़-लिखकर अव्वल हो बच्चा गोबर फेंक रहा
घूस सीना ताने खड़ा नौकरी में दीवार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।
दर-डर भटक रहा युवा कोई काम तो बताओ
जैसे आप कमा रहे हो वैसे मुझे भी कमवाओ
बस खर्चा निकालता रहूं एक आधार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।
और भी दुर्दिन देखोगे तुमने सरकार बनाया था
आईटी करके तुमने ही चुनावी कैम्पेन चलाया था
एमए पास ढो रहे हैं अढिया बेरोजगार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।
यश तूँ भी चल अब कोई रास्ता तलाश कर
ऐसे अकेले बैठकर ना खुद को निराश कर
लोग पढ़ते हैं तेरी कविता बड़े लाचार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।
©प्रवीन यश
हरहुआ, वाराणसी
9450112497
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