शुक्रवार, 16 नवंबर 2012




वो पत्ती थी गुलाब की
मैं बूद था शराब का
वो मौसम सदाबहार थी
मैं पतझड़ का सबाब था।।
मैं कितना खराब, मैं कितना खराब था।।
वो फुलो सी हसती थी
मैं कांटों सा धसता था
वो प्यासे का कुंआ ​थी
मैं सुखा हुआ तालाब था
मैं कितना खराब था, मैं कितना खराब था।।
अब बदला मौसम पलभर में
सब बदल गया ​जीवन भर में
कितना टूटा दिल में मेरा
आखों में अश्कों का बरसात था
मैं कितना खराब था, मैं कितना खराब था।।
वो भुल गयी सूखे पत्तों सा
मै लटका भवरों के छत्तों सा
कहने को तो उस्ताद था
लेकिन हॉ यश मैं कितना खराब था क्या.....................
सचमुच मैं इतना खराब था।।

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