शुक्रवार, 2 नवंबर 2012


खुद को भी नहीं समझ सका इतना अन्जान था वो
था तो बहुत खुश नसीब पर बहुत परेशान था वो।
कहीं मॉगा तो खुशी मिली नहीं तो आशु हर राहो में थे
खुद का गम भुलाकर गैरों पर कितना मेहरबान था वो।।

खुद को भी नहीं समझ सका ..........................

पल में खुश हो जाता था पल में अश्क बहाता था।
पल में कहता साथ रहो पल भर ही साथ निभाता था।।
जाने किस मिट्टी से बना जाने किस दुनियॉ में गया।
था कुछ दिन साथ मेरे मैं भुल गया मेहमान था वों।।

खुद को भी नहीं समझ सका ..........................

जाने क्या चाहती थी दुनियॉ जाने क्यों डाहती थी दुनियॉ।
किसी मोंड पर गाली तो किसी मोड पर सराहती थी दुनियॉ।।
दुनियॉ के लिये सोता नहीं था खुद अपने का होता नहीं था।
जाने कितने कष्ट मिले फिर चेहरे पे लिये मुश्कान था वो।।

खुद को भी नहीं समझ सका ..........................
दिल का बडा नादान था वो
दुनियॉ से अन्जान था वो
कहने को शैतान था वो
पर सचमुच मेरी जान था वो
हॉ ‘यश‘ , सच कहते हैं बडा महान था वों।

                                                                   


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