सोमवार, 31 जुलाई 2017


मैं तेरे दिल में बसता था तेरे ही दिल में रहता हूं।
तुम्हें सुनाई देता है क्या जो मैं लिखता कहता हूं।।
तुम खुश हो या रोती हो यह मुझे बता दो एक दफा
क्या अभी मोहब्बत है जिंदा या भूल गयी सब प्यार वफा
क्या अब भी हिचकी आती है जब याद तुझे मैं करता हूं।
तुम्हें सुनाई देता है क्या जो मैं लिखता कहता हूं।।

वह दिन भी बड़े सुहाने थे कल जब तुम पढ़ने आती थी
जब मुझे नहीं कुछ आता था तुम बहुत मुझे समझाती थी
मैं कल बुद्धू जैसा था पर आज बहुत कुछ समझा हूं।
तुम्हें सुनाई देता है क्या जो मैं लिखता कहता हूं।।

कहीं मम्मी पापा ना समझें तुम प्यार को बड़ा छुपाती थी
घर मुझे सहेली बता बता दिन रात बहुत बतियाती थी
अब प्रेम छुपाती हो कैसे अब भी तेरी बातें करता हूं।
तुम्हें सुनाई देता है क्या जो मैं लिखता कहता हूं।।

है अगर शिकायत कोई तो एक बार बताने आ जाना
दुनियां की चिंता छोड़ के बस तुम प्यार निभाने आ जाना
सुन लो तेरी हर चिट्ठी को यश आज भी पढ़ता रहता हूं।
तुम्हें सुनाई देता है क्या जो मैं लिखता कहता हूं।।

©प्रवीन यश
हरहुआ, वाराणसी
9450112497



शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।
कुछ लूट के बैठ विपक्ष में तो कुछ सरकार बनके।।
कौन कहता है कि भारत आजाद हो गया है
देश के सिर फिर विश्वगुरु का ताज हो रहा है
कुछ भाषण देकर लूट रहे कुछ परचार करके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।

बच्चों को पढ़ाने के लिए बाप खेत बेच रहा
पढ़-लिखकर अव्वल हो बच्चा गोबर फेंक रहा
घूस सीना ताने खड़ा नौकरी में दीवार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।

दर-डर भटक रहा युवा कोई काम तो बताओ
जैसे आप कमा रहे हो वैसे मुझे भी कमवाओ
बस खर्चा निकालता रहूं एक आधार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।

और भी दुर्दिन देखोगे तुमने सरकार बनाया था
आईटी करके तुमने ही चुनावी कैम्पेन चलाया था
एमए पास ढो रहे हैं अढिया बेरोजगार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।

यश तूँ भी चल अब कोई रास्ता तलाश कर
ऐसे अकेले बैठकर ना खुद को निराश कर
लोग पढ़ते हैं तेरी कविता बड़े लाचार बनके।
कुछ नेता बनके लूट रहे कुछ पत्रकार बनके।।

©प्रवीन यश
हरहुआ, वाराणसी
9450112497


सोमवार, 24 जुलाई 2017

उनके चेहरे पे खुशियां सलामत रहे
उनकी हरपल हँसी में कयामत रहे
उनके जीवन में हमसा हजारों मिलें
जिनके दिल में समायी सी चाहत रहे......
हम मिलें ना मिले कोई गम भी नहीं
जितना हम मिल गए हैं वो कम भी नहीं
अब भले ही मोहब्बत वो ना है बची
जो बची है वही बस सलामत रहे
उनकी हर पल हंसी में कयामत रहे......
उनको वो सब मिले जो मुझे ना मिला
फूल वो भी खिले जो यहाँ ना खिला
उमर भर उनका दामन महकता रहे
कांटों से उनका आँचल सलामत रहे
उनकी हर पल हंसी में कयामत रहे......
यश तो उनकी हरपल भलाई सुना
उनके जीवन में रिश्तों का ताना बुना
आधी उमर पत्थरों सी रही उनकी
आधी में सोने चांदी की आदत रहे
उनकी हर पल हंसी में कयामत रहे...... हे ईश्वर उनके चेहरे पे खुशियां सलामत रहे
©प्रवीन यश
हरहुआ, वाराणसी
9450112497


जिनकी बन्द होती हैं आंखें...उनके पास सपने होते हैं।

खुली रहे आंखें जिनकी.......उनके तो अपने-अपने होते हैं।

©प्रवीन यश


जिनकी बन्द होती हैं आंखें...उनके पास सपने होते हैं।

खुली रहे आंखें जिनकी.......उनके तो अपने-अपने होते हैं।

©प्रवीन यश


रविवार, 23 जुलाई 2017

गम की राहों से मेरी अर्थी निकल रही थी
तूफान की लहरों पर सच करें चिता जल रही थी
ना जाने किस शख्स में रोशनी कर दी
वरना मुझे चिरागों से शाम-ए-जिंदगी ढल रही थी।

अश्क गिरे आंखों से बरसात की तरह 
हम बिछड़ गए उनसे रात की तरह
जिंदगी डूबी रही समंदर में तो क्या हुआ
दिल रोता है बिरहन के प्यास की तरह।।


वो जिंदगी में आए हसीन कल की तरह
लिखे भेजे हर खत को गजल की तरह 
हम क्या कहें अपने दिल की दास्तां यारों
वो अब याद भी करते हैं तो गुजरे कल की तरह।।


चले जाएंगे तेरे जीवन से अनजानों की तरह
भूल जाना तुम भी मुझे बेगानों की तरह
मैं मर जाऊं तो भी आंसू ना गिराना
मेरी मातम में आ जाना मेहमानों की तरह।।

एक सवाल मेरे दिल में घर कर गया है
जैसे शांत जल में सुनामी लहर कर गया है
मैं उनके साथ रहकर बेगाना कैसे हो गया 
वाे हंसती-खेलती जिंदगी में जहर भर गया है।।


याद गर आए तो मेरी याद में रोना
भूल जाना मेरे हर बात में रोना 
क्या हुआ जो अश्क मेरे तू न समझे 
हो चर्चा मेरी तो तुम रात में रोना 


दोस्ती तेरी मेरे दिल में एक जख्म सी कर गई 
दिल में लगे जख्मों को और नम सी कर गई 
हम को तो दर्द सहने की आदत सी है लेकिन  
तेरी दोस्ती जख्मों में और जख्म सी कर गई।।



याद कर लेना जब परेशान हो जाओगी
मैं आऊंगा जरूर जब ध्यान लगाओगी 
मरने के बाद तो  जलकर राख हो आऊंगा 
क्या पता तुम राख में मुझे ढूंढ पाओगी


बहुत करीब थी खुशियां वह हाथ छोड़ गए 
मंजिल सामने देखकर वह साथ छोड़ गए 
गिरकर संभलना मुश्किल हो गया ये दोस्त 
मुझे दुःखी होते ही करना बात  छोड़ गए।।



हर रात उनकी याद तड़पाती रहती है
सांसे भी वफा की गीत गाती रहती हैं 
यकीं नहीं होता वह भूलना चाहते हैं 
बातें कल की आज सितम ढाती रहती हैं।।


इस दिल में दर्द की कसक अभी बाकी है
भींगी हैं आखें लेकिन पलक अभी बाकी है
जिंदगी मेरी मुझको चिढ़ाती है ऐ मेरे दोस्त 
रूका क्यों है यश जब सड़क अभी बाकी है।।


अश्क आंखों से बहते बहते एक निशान बना दिए
मीट ना पाए कभी वो ऐसा पहचान बना दिए
दिल में उनका दर्द हमेशा रहेगा ऐ दोस्त 
क्यों यश जान गवा कर उन्हें जान बना दिए।।


जीवन में हर शख्स मुझे आजमाता रहा 
मैं पागल‚ हर राह में ठोकर खाता रहा 
ना पता था वह भी छोड़ जाएंगे हमें 
जिनके सुख दुख में मैं साथ निभाता रहा।।


यादों को दबाकर वह नादान बन बैठी हैं 
उसे क्या पता वो मेरी जान बन बैठी हैं
दुनिया को को जानकर भी अन्जान बन बैठी हैं 
उन्हें क्या पता वो  मेरी जान बन बैठी हैं।।

© प्रवीन यश
कोईराजपुर, हरहुआ‚ वाराणसी
09450112497
08423841557

दर्द को भी हमने रोते देखा है

दर्द को भी हमने रोते देखा है 
आप सोचेंगे ऐसा कहां होता है 
लेकिन यह सच है कि दर्द को भी हमने रोते देखा है 
एक छोटा बच्चा रोड पर नंगा डाल रहा था 
उसे दर्द देने को दर्द भी मचल रहा था 
उसके ऊपर दुख दर्द का जादू नहीं चल पाया 
वह रोया तो जरुर लेकिन आंसू नहीं निकल पाया 
दुख दर्द से बेखबर उसे रोड किनारे सोते देखा है 
दर्द को भी हमने रोते देखा है.......
वह बच्चा बढ़ा हुआ तकदीर साथ थी
माता-पिता की दी हुई जागीर साथ थी 
बढ़ने लगा कदम तो ठोकर ना रोक पाया 
दुख दर्द का कोई उसे असर न रोक पाया 
गरीबी बेबसी में भी रिस्तों को ढोते देखा है
दर्द को भी हमने रोते देखा है.....................
वह इतना बेदर्द था कि दर्द को भी उससे दर्द था 
क्या देगा खुदा दर्द उसे जब दर्द भी उसका हमदर्द था 
जीवन के बीच पड़ाव में उसे ऐसा लगा ठोकर 
जो साथ में रहा उससे भी नहीं दुख दर्द कहा रोकर 
दर्द–ए–गम को साथ लेकर हमने आंसू पिरोते देखा है 
लेकिन यश सच है कि हमने दर्द को भी रोते देखा है...........


© प्रवीन यश
कोईराजपुर, वाराणसी
09450112497
08423841557

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