बुधवार, 10 मई 2017

बिन तेरे बदहवास सी जिंदगी हो गई है
ठंडी में फटे लिबास सी जिंदगी हो गई है
तेरे बिन न कहीं लगता है मन न चलती है कलम
कैसे लिखूं जब उदास सी जिंदगी हो गई है
बिन तेरे बदहवास सी......

छोड़कर सारा जग यूँ हमारा बनी तुम
जब भी तन्हा रहा तो सहारा बनी तुम
लगा मेरी आंखों का तारा बनी तुम
चाँद ही तेरा जीवनसाथी निकला मैं क्या करूं
वैसे भी अब मेरी सूर्यास्त सी जिंदगी हो गई है।
बिन तेरे बदहवास सी.........

जैसे बारिश के आने से आती है हरियाली
वैसे अभी तक मेरी रखी तूने दुआ खयाली
पतझड़ भी मिलता तो भी खुश हो लेता लेकिन
देखो अब तो सुखी घास सी जिंदगी हो गई है
बिन तेरे बदहवास सी........

हवाओं का चलना पत्तियों का हिलना
तुम्हें याद है ना वो छुप-छुप के मिलना
लिखूं क्या कहूं क्या तेरे बिन रहूं क्या
सुनो अब आखरी सांस सी जिंदगी हो गई है
बिन तेरे बदहवास सी......

जाओ तुमको जाना है ये यश क्या करेगा
केवल तुम जानती हो ये बस क्या करेगा
कलम रोज कलप कर डायरी पर लिखेगी
क्यों तेरे चाहत साथ सी जिंदगी हो गयी है।
बिन तेरे बदहवास सी........


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