अपना जन गण मन खतरे में है
पत्रकारों की कलम खतरे में है।
नेताओं से उम्मीद क्यों रखे हो
इनसे ही अपना वतन खतरे में है।
कलम बिकती है चन्द रुपयों में
मेरी आँखों ने बिकते देखा है
बिके हुए कलमवीरों के द्वारा
अच्छे को गलत लिखते देखा है
क्या होगी उस बच्चे की हालत
गर्भ में जिसका तन खतरे में है।
बड़े महान हैं कुछ लोग दुनियां में
अपने मुह मिया मिठ्ठू बनते है
नेताओ की जी हुजूरी करते है
और उनके ही पिठ्ठू बनते हैं
रंगे सियारों की बातें तो सुनिये
ये कहते हैं शेरों से वन खतरे में है
गर पत्रकार हो तो दलाल मत बनो
दलाली करना है तो पत्रकार मत बनो
“यश” लाश की दूर्दशा उन्होंने ही किया
जो रोके कह रहें हैं कफन खतरे में है।
© प्रवीन यादव “ यश ”
0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें