शुक्रवार, 25 जनवरी 2013



तेरे अश्‍कों को भी अपने आखों से बहना चाहता था
तेरे एक चाहत में हद से गुजर जाना चाहता था मै।
पर तू मुझे इस कबिल समझ नहीं पाया 
बस तेरी मोहब्‍बत में खुद को लुटाना चाहता था मैं।।




मुझे तेरा वो प्‍यार कभी मिल नहीं पायेगा अब 
क्‍यों बनी तुम गैर की दिल मुझको रूलायेगा अब ।
तू जो समझलो वो करो मै कैसे कर सकता मना
पर बात इतना मान लो दिल चैन ना पायेगा अब।।


0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

कुछ खोजना हो तो यहां से खोजें

योगदान देने वाला व्यक्ति

पिता जी के सर की ताज है बेटी, हंसता हुआ एक समाज है बेटी

पिता जी के सर की ताज है बेटी हंसता हुआ एक समाज है बेटी लेकिन बेटी ऐसे नहीं हो सकती जैसे नजर आयी आज है बेटी पिता से है खतरा बता वो रह...

कुछ नया सोचने की आदत है हममे। कुछ नया करने की फितरत है हममें।।
क्या पता तकदीर कल कहॉ ले जाये। यू आज ही में जीने की चाहत है हममें।।

मेरे पापुलर अल्फाज....