सोमवार, 3 मार्च 2014

मछलियों के बिना जलाशय का पानी का भी अभागा नजर आता है।
उसका हमारे दिल में आना एक तरह से प्राकृतिक घटना ही थी नहीं तो सांसारिक रूप से हम लोगों का मिलना असंभव था कारण एक तरफ वह लडाकू तो दूसरी तरफ मैं भी कट्टर हमारा एकदम से नहीं जमता लेकिन प्रकृति हमें मिलाना चाहती थी हो सकता है प्रकृति की निगाह में हमारे अन्दर का प्यार कहीं न कहीं एक दूसरे के बिन अधूरा सा रहता।

यह बात मेरे दिल में हमेशा ही एक बडे प्रश्न की तरह दिमाग चाटते रहती है यही सोचते हुए मैं एक दिन सायंकाल को मैं वरूणा नदी के किनारे गया। वरूणा नदी मेरे घर से लगभग सौ मीटर दूरी पर पूर्व से होते हुए पश्चिम की तरफ जाती है वहॉ जाने के बाद मैं देखा कि एकदम सूनसान है कहीं से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रहा था सुबह के समय में जहॉ नहाने वालों की कतार भोर में से ही लग जाती है नदी में नहाने वाले 10–20 वर्ष के बच्चे दूर से दौडत हुए आते है और चितल्लाते हुए नदी के पानी में छलांग लगाते हुए कुद जाते हैं इस कोलाकल से पूरे वातारण मे होहल्ला मचा रहता है दोपहर के समय चरवाहों की मण्डली नदी के किनारे गाया भैंस चराने के लिये निकल जाती है जिससे वहॉ शोर सराबा मचा रहता है लकिन सायंकाल कोई आदमी ऐसा नहीं था जो कि नदी के किनारे हो नदी के किनारे उस समय पूरी तरह से सियापा पसरा हुआ था। मैं सोचने लगा कि एक ही दिन में एक समय ऐसा आता है जब इस नदी के किनारे शोर मचाने वालों. खेलने वालों. तथाअन्य लोगों द्वारा कौतुहल मचा रहता है लेकिन इस समय इधर कोई आवाज नहीं है। मैं नदी के किनारे–किनारे चलते चला जा रहा हो जैसे किसी वस्तु की खोज में निकला हुआ हूं नदी के उस पार के वन में (जिसे लो बबुआ बाबा का वन करते हैं) एक मोर ने आवाज लगाया जैसे वह अपने घर से बाहर निकले हुए जानवरों को आगाह कर रहा हो कि शाम हो गया है सभी लोग अपने घरों को लौट जाओ मोर की आवाज सूनकर मैं वही पर नदी के किनारे बैठने का मन बनाया. कुछ दूरी पर साफ जगह देखकर मैं वहॉ बैठ गया और नदी के निर्मल जल को निहारने लगा। उसमें अठखलियॉ लगाते हुए मछलियों के बच्चों का झुण्ड आगे आगे और बडी मछलियॉ पीछे–पीछे पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चल रही थी उनको देखकर लग रहा हो कि वह डूबते हुए सूर्य कि विदाई करने जा रही हैं और अगले दिन आने का आग्रह कर रही हों। जब वहॉ एकान्त में मेरा मन मुझे पाता और कोई विचार जैसे ही मन पर हावि होने का प्रयास करता पानी में उझलकूद मचा रही मछलियॉ को देखकर उसे भी शान्त होने पर मजबूर होना पडता और मन अपने आप विचारों को त्याकर शांत होकर मछलियों द्वारा पानी हीलोरने की आवाज से मछलियों और पानी के राग को पहचानते हुए उनके गीत को समझने का प्रयास करता। इस प्रकार करीब एक घंटे तक मैं नदी के किनारे बैठे रहा। नदी के पानी में एक गह कई छोटीछोटी मछलियॉ उछल कूद रही थी कुछ देर बाद वहॉ एक बडी सी मछली उछली मैं तो एकदम आश्चर्य होकर उधर देखते रह गया सोचने लगा कि ये मछलियॉ पानी में कितना खुश रहती हैं बहुत ही आनंदित होती हैं इनके सैर करने का शायद कोई अन्त नहीं होता होगा यू सन्न से किनारे आती और ऐसे चली जाती जैसे किनारे से कोई चीज लेने आयी और लेकर बीच नदी भाग गयी। कोई अपनी हैरतअंगेज कला के रूप में पानी में ऐसे उछलती कि उसका पूरा शरीर पानी से बाहर निकल जाता उनको देखकर तो ऐसा भी लगता कि नदी का जल उनको गोद में लेकर उछाल रहा हो और आसमान की और फेंक रहा हो तथा दिखा रहा हो कि देख लो बाहरी दुनियां को और मछलियॉ उपर आने के बाद हसते हुऐ उसके गोद में पुनः समा जाती।  उस समय मुझे एक बात समझ में आयी कि क्यों लोग कहते हैं कि पानी बिना मछली नहीं रह सकती हैॽ क्योंकि वास्तव में पानी जितना प्यार मछलियों और उसो बच्चों से करता है उतना शायद धरा भी नहीं कर पाती और उनको तडपते हुए अपने प्राण त्यागने पडते हैं। इधर वहीं बैठै मै। मैं यही सोचता रहा समय भी काफी हो गया था थोडे ही समय मं अंधेरा हो जाता नदी का रास्ता जहॉ मैं बैठा था वहॉ ठीक नहीं होने के कारण अंधेरा होने पर खतरे से खाली नहीं था क्योंकि सर्प बिच्छू सहित अन्य कई जहरिले जन्तु अंधेरे मेंदिखाई नहीं देते हैं और डस लेते हैं मैं उठा और सोचा की अब मुझे भी चलना चाहिए मेरे उठते ही सभी मछलियां एकदम शान्त हो गयी ऐसा लगा कि वे भयभीत होकर पुनः पानी में समा गयी। मछलियों और पानी के प्यार की बातें मन में सोचते-सोचते मैं वापस आ रहा था। कुछ दूर आगे आने पर देखा की रास्ते  के बगल में नदी के बाढ का पानी एक बडे गढ्ढे में एकत्र था पानी पूरी तरह से मैंला था उसमें खरपतवार संड गये थे जिससे बदबू आ रही थीकाई लग जाने के कारण पानी का उपरी सतर बदरंग हो गया था पानी को देखकर मैं रूक गया और काफी ध्यान से देखने लगा कि यह पानी ऐसा क्यों हैं क्या इसमें मछलियॉ नहीं हैं यही सोचते हुए मैं ने वहॉ दस से पन्द्रह मिनट गुजादिये लकिन पानी में कोई हलचल नहीं मिला जिससे मुझे  यह आभाष हुआ कि इस पानी में कोई भी मछली नहीं हैं फिर पानी की बात याद आयी और पानी के तरफ ध्यान गया तो लगा कि यह पानी कितना अभागा है या यू कह लिया जाय कि उस जल का जीवन अधजल में फंसा है। क्योंकि इस जल में यदि मछलियां होती तो शायद यह जल ऐसा नहीं होता और यह भी हसता गाता राग सुनाता और फिर इसका जीवन समाप्त हो जाता एकदिन यह भी हंसी-खुशी से पृथ्वी के गर्भ में समा जाता। इसके बाद मेरे मन में एक बात दौड लगायी वह यह कि पानी के बिना मछलियॉ तो शायद मर जाती हैं लेकिन मछलियॉ न होने पर पानी न मर पाता है न जी पाता है।
प्रवीन कुमार यश

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014



जाने किससे क्या कहें वफाऐं हमसे भी हो सकती हैं।
दिल अगर लग जाए तो गुनाहें हमसे भी हो सकती हैं।।

कोई सुनने के लिये बाते चेहरा तो घुमाए
मुलाकात को लाचार निगाहें हमसे भी हो सकती हैं।।

कई कलियॉ बागों में खिलती हुई नजर आती हैं।
तितलियॉ फूलों से मिलती हुई नजर आती हैं।।
देखकर उनको हम नजरे मिला लेते हैं
क्योंकि मोहब्बत में कुछ सजायें हमसे भी हो सकती हैं।।

हमसे कोई दिल मिलाने का प्रयास तो करे
मैं कैसे कह दू पहले कोई विश्वास तो करें
'यश' बोलता है कुछ अदाऐं हमसे भी हो सकती हैं।।
दिल अगर लग जाए तो गुनाहें हमसे भी हो सकती हैं।।


प्रवीन यादव 'यश'


तुम साथ थी तो जहॉ साथ चलता था
मैं भी नहीं तनहां साथ चलता था।

वो स्कूल के दिन या कालेज के दिन
तुम रहती थी नहीं एक दिन मेंरे बिन
क्या कहें जिंदगी मेंरे क्या साथ चलता था।।
तुम साथ थी जो जहॉ साथ चलता था।।


तेरे काजल की बिन्दीया लगी कान नीचे
और हर पल तेरा दुआ साथ चलाता था।।
तुम साथ थी जो जहॉ साथ चलता था।।

गलत काम करने से रोके तु ऐसे
कि लगता था जैसे खुदा साथ चलता था।।
तुम साथ थी जो जहॉ साथ चलता था।।

प्रवीन यादव 'यश'



कल जब थोड़ा सा पीया तो तेरी याद आ गयी।
सच जब पैग हाथ ​में लिया तो तेरी याद आ गयी।
पहले घंटो बैठकर तेरे बारे में चर्चा करते थे
एक तू ही ​था जिसपर जी जान से मरते थे
तु छोड़ दिया क्यों मुझे कसमें खाने के बाद याद आयी गयी।
सच जब पैग हाथ में लिया तो तेरी याद आ गयी।।



वो चलता गया हम भी चलते गये
वो बदलता गया हम बदलते गये।
मिलकर देख कभी एक प्यारी सुबह
ढल रही जिंदगी शाम ढलते गये।।

शाम प्यारी ​सी थी रात प्यारी सी थी
उसके सुख—दुख में एक भागीदारी सी थी
अब भरोसे की डोर यू लगी टूटनें
कि इन आंखों से आंशु निकलते गये।।

वो हंसकर के मुझसे तेरा बात करना
हो गलती कोई तो मुझे माफ करना
जब रूठा था मैं तो मनाने आती थी
अब तो गुस्से में 'यश' और जलते गये।।

वो चलता गया हम भी चलते गये
वो बदलता गया हम बदलते गये।
कि इन आंखों से आंशु निकलते गये।।

प्रवीन यादव'यश'

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013


कलम के सिपाही आजाद हैं।

मीडिया में आज उपर बैठे गुरू घ्‍ांटाल हैं,
कोई कहता फ्राड तो कोई कहता दलाल है।
कुछ पत्रकारों पर हमें आज भी नाज है,
देखो दलालों कलम के सिपाही आजाद हैं।।

कुछ लोग मैनेज कराने का प्रयास करते हैं,
खबरों को हरदम दबाने का प्रयास करते हैं।
कुछ लोग लिख देते तो लग जाती आग है
देखो दलालों कलम के सिपाही आजाद हैं।।

ये कलम खिरी सांस तक ऐसे ही चलेती रहेंगी,
हमेशा अपने वाक्‍यों से आग लगलती रहेंगी।
मौत का भी गम नहीं अब हमारे पास हैं,
देखो दलालों कलम के सिपाही आजाद हैं।।

आज हमारा हर लेख तुमको चिढा रहा होगा,
जानता हू मैं कि तू भी मुझे गरिया रहा होगा।
जो निर्भिक पत्रकार हैं ‘यश‘ उनकी जिन्‍दाबाद है,
देखो दलालों कलम के सिपाही आजाद हैं।।

BY:-प्रवीन यादव 'यश'

बुधवार, 25 सितंबर 2013

सुन री...चिड़िया 
तू सुखी शाख पर 
बैठ बैठ क्या सोचे 
सब पत्ते झर गए पंछी
नयी नगरी को कूचे
तेरे मौसम की रीत नहीं
इस जग से विपरीत
नाम का सिक्का चल जाये 
तो काम को कौन पूछे 
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---------मंजुषा पांडे


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कुछ नया सोचने की आदत है हममे। कुछ नया करने की फितरत है हममें।।
क्या पता तकदीर कल कहॉ ले जाये। यू आज ही में जीने की चाहत है हममें।।

मेरे पापुलर अल्फाज....