बुधवार, 19 फ़रवरी 2014


तुम साथ थी तो जहॉ साथ चलता था
मैं भी नहीं तनहां साथ चलता था।

वो स्कूल के दिन या कालेज के दिन
तुम रहती थी नहीं एक दिन मेंरे बिन
क्या कहें जिंदगी मेंरे क्या साथ चलता था।।
तुम साथ थी जो जहॉ साथ चलता था।।


तेरे काजल की बिन्दीया लगी कान नीचे
और हर पल तेरा दुआ साथ चलाता था।।
तुम साथ थी जो जहॉ साथ चलता था।।

गलत काम करने से रोके तु ऐसे
कि लगता था जैसे खुदा साथ चलता था।।
तुम साथ थी जो जहॉ साथ चलता था।।

प्रवीन यादव 'यश'



0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

कुछ खोजना हो तो यहां से खोजें

योगदान देने वाला व्यक्ति

पिता जी के सर की ताज है बेटी, हंसता हुआ एक समाज है बेटी

पिता जी के सर की ताज है बेटी हंसता हुआ एक समाज है बेटी लेकिन बेटी ऐसे नहीं हो सकती जैसे नजर आयी आज है बेटी पिता से है खतरा बता वो रह...

कुछ नया सोचने की आदत है हममे। कुछ नया करने की फितरत है हममें।।
क्या पता तकदीर कल कहॉ ले जाये। यू आज ही में जीने की चाहत है हममें।।

मेरे पापुलर अल्फाज....